
कक्का की चौपाल
“काग़ज़ दिन में, धौंस रात में इंजन आगे, इंसाफ पीछे; जहाँ ट्रैक्टर बन गया नेता और सिस्टम साइलेंस मोड में चला गया”
कैलाश पाण्डेय की कलम से
बरगद की पुरानी जड़ों में आज मिट्टी कम और डर ज़्यादा भरा हुआ था। हवा जब पत्तों से टकराती तो वह सरसराहट नहीं, बल्कि सरकारी फाइलों के बेरुख़ी से पलटे जाने जैसी आवाज़ पैदा करती। चौपाल में खाटें तो बिछी थीं, लेकिन बैठने का साहस किसी के चेहरे पर नहीं था। यह कोई साधारण सुबह नहीं थी; यह उस इलाके की सुबह थी जहाँ ट्रैक्टर अब मेहनत का औज़ार नहीं, बल्कि सत्ता, दबदबे और अवैध तंत्र का प्रतीक बन चुका है।
कक्का खाट के सिरे पर बैठे थे आँखें आधी बंद, जैसे उन्होंने बहुत कुछ देख लिया हो और अब देखना भी बोझ लगने लगा हो। पास ही घसीटा बैठा था, जो आमतौर पर हँसी-मज़ाक में सबसे आगे रहता था, मगर आज उसके चेहरे पर हँसी नहीं, घुटन की साफ़ लकीरें थीं। दूसरी ओर चौरंगी लाल था, नियमों, आदेशों और बहानों की गठरी ढोते हुए, बार-बार पसीना पोंछता हुआ। थोड़ी दूरी पर रिपोर्टर खड़ा था कंधे पर कैमरा नहीं, जेब में नोटबुक; क्योंकि इस इलाके में तस्वीरें खींचने से ज़्यादा ज़रूरी था हिम्मत जुटाना।
तभी दूर से ट्रैक्टर की गड़गड़ाहट सुनाई दी—ऐसी आवाज़ कि धरती नहीं, दिल काँप जाए। कक्का ने आँखें खोलीं और धीमी लेकिन भारी आवाज़ में बोले, “सुन रहे हो? ये कोई इंजन नहीं है, ये पूरी व्यवस्था की कराह है।” घसीटा तुरंत बोल पड़ा कि पहले यही ट्रैक्टर मेहनत और रोज़गार का प्रतीक था, लेकिन अब वह खनिज माफिया का दूत बन चुका है—दिन में काग़ज़ पूरे, रात में नियम चकनाचूर। कोई अधिकारी अगर रोकने की कोशिश करे तो पहले धमकी मिलती है, फिर हमला होता है और अगर मामला बढ़ जाए तो नेतागिरी की छाया सब ढक लेती है।
चौरंगी लाल ने बेहद धीमी आवाज़ में कहा कि ऊपर से दबाव रहता है, सब कुछ नियम-कानून से नहीं चल पाता। इस पर घसीटा तंज कसते हुए बोला—खनिज विभाग देखता है, लेकिन रात में नहीं; वन विभाग देखता है, पर पेड़ों के पीछे से; पुलिस देखती है, पर नेता के इशारे पर; राजस्व विभाग देखता है, पर सिर्फ़ नक्शों में; और पूरा सिस्टम सब कुछ देखता है, लेकिन बोलता नहीं। हवा और तेज़ हो गई, पत्ते झड़कर ज़मीन पर ऐसे गिरे मानो गवाह टूट-टूटकर गिर रहे हों। रिपोर्टर ने नोटबुक में लिखा—यह सिर्फ़ अवैध खनन नहीं, यह संगठित मौन है।
घसीटा ने आगे बताया कि पिछले दिनों वन विभाग एक अधिकारी ने ट्रैक्टर रोका था। काग़ज़ माँगे तो जवाब में धक्का मिला, विरोध किया तो हमला हुआ और शाम होते-होते वही ट्रैक्टर बिना नंबर और बिना किसी डर के थाने के सामने से गुजर गया। चौरंगी लाल ने आँखें चुरा लीं और बस इतना कहा—मामला ऊपर तक है। इस पर कक्का की आवाज़ में लोहे जैसी ठंडक उतर आई जब अपराध ऊपर तक पहुँच जाए, तो नीचे खड़ा ईमानदार आदमी अनाथ हो जाता है।
चौपाल में सन्नाटा पसर गया। कहीं ढोल या शोर नहीं, यहाँ तो सायरन बजना चाहिए था, लेकिन सायरन कभी नहीं बजा क्योंकि यहाँ सायरन तभी बजता है जब कोई कमज़ोर पकड़ा जाए। रिपोर्टर ने माहौल तोड़ते हुए कहा कि यह इलाका अकेला नहीं है; कोयलांचल हो या पूरा अनूपपुर ज़िला, हर जगह ट्रैक्टर वही कहानी सुना रहा है माफिया का पैसा, नेता का संरक्षण और अधिकारियों की मजबूरी। घसीटा ने ज़मीन की ओर देखते हुए कहा कि सब जानते हैं, लेकिन जो बोलता है वह या तो पिटता है, या ट्रांसफर हो जाता है, या फिर चुप रहना सीख लेता है।
कक्का अचानक उठ खड़े हुए। खाट चरमराई, जैसे कोई पुराना सिस्टम हिल गया हो। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई ट्रैक्टर से नहीं, डर और लालच से है; जिस दिन डर टूटेगा, उस दिन इंजन अपने आप बंद हो जाएगा। मगर चौपाल यह भी जानती थी कि खनिज माफिया आसानी से नहीं टूटता—वह फाइलों में पलता है, भाषणों में छिपता है और कार्रवाई के नाम पर जांच बनकर सो जाता है।
तभी फिर वही ट्रैक्टर की आवाज़ आई—इस बार और नज़दीक, मानो खुलेआम कह रही हो कि मैं कानून से तेज़ हूँ। रिपोर्टर ने अपनी नोटबुक में अंतिम पंक्तियाँ लिखीं कि यह कहानी किसी एक ट्रैक्टर की नहीं, यह उस व्यवस्था की कहानी है जहाँ माफिया हमला करता है, नेता बचाता है और सिस्टम मूक रह जाता है; और जब सिस्टम चुप हो जाता है ।बरगद की छाया लंबी हो चुकी थी, चौपाल धीरे-धीरे बिखरने लगी, लेकिन सवाल वहीं खड़े रह गए—इंजन से ज़्यादा शोर आख़िर कब करेगा कानून?
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