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पॉकेट गवाह नहीं अब डिजिटल गवाह मुकदमों की धुरी बनी- डी.सी. सागर -

अदालत का कक्ष अक्सर विरोधाभासों का मंच होता है। यहाँ न्याय की तराजू इस बात पर टिकी होती है कि गवाह के शब्द कितने वजनदार हैं। लेकिन कानूनी गलियारों में एक शब्द अक्सर चर्चा में रहता है- 'पॉकेट गवाह'। यह वह गवाह है जिसे जांच एजेंसियां अपनी सुविधा के अनुसार 'जेब' में रखती हैं, सिखाती हैं और जरूरत पड़ने पर कमजोर केस को सहारा देने के लिए पेश कर देती हैं। एक वकील के तौर पर मैंने देखा है कि कैसे गढ़ी हुई गवाहियां न्याय की प्रक्रिया को दूषित करती हैं। लेकिन 'डिजिटल इंडिया' के इस दौर में अब खेल बदल रहा है। अब हमारी अदालतों में इंसान से ज्यादा तकनीक बोल रही है। न्यायपालिका का कड़ा रुखः गवाह या कठपुतली? माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दशकों से पॉकेट गवाहों की संस्कृति पर प्रहार किया है। सतपाल बनाम दिल्ली प्रशासन (1976) से लेकर कर्नाटक राज्य बनाम यारप्पा रेड्डी (1999) तक, अदालतों ने बार-बार चेतावनी दी है कि पुलिस के 'स्टॉक गवाहों' पर आँख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता। महेंद्र चावला (2019) के मामले में तो कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि गवाह का निष्पक्ष होना अनुच्छेद 21 के तहत उसका मौलिक अधिकार है। अदालतों का स्पष्ट संदेश हैः न्याय सुविधा का मोहताज नहीं हो सकता। भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) 2023 : डिजिटल गवाह को नई शक्ति नए कानून (BSA 2023) ने साक्ष्य की परिभाषा को 21वीं सदी के अनुरूप ढाल दिया है। अब डिजिटल गवाह-जैसे सीसीटीवी फुटेज, व्हाट्सएप चैट और जीपीएस रिकॉर्ड्स-महज सहायक दस्तावेज नहीं, बल्कि मुकदमों की धुरी हैं। धारा 63: इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स की स्वीकार्यता को सरल और विश्वसनीय बनाया गया है। धारा 134: यह कानून का पुराना सिद्धांत है जिसे अब और मजबूती मिली है- 'गवाहों को तोला जाना चाहिए, गिना नहीं।' यानी 10 सिखाए हुए पॉकेट गवाहों पर एक अकेला 'डिजिटल रिकॉर्ड' भारी है। फॉरेंसिक विस्तारः धारा 45-51 के तहत अब डिजिटल विशेषज्ञों की भूमिका को कानूनी मान्यता देकर जांच में इंसानी दखल (Manual Manipulation) की गुंजाइश कम कर दी गई है। तुलनाः विश्वसनीयता की कसौटी जहाँ एक पॉकेट गवाह भय, लालच या दबाव में अपना बयान बदल सकता है (Hostile Witness), वहीं एक डिजिटल गवाह निष्पक्ष होता है। वह उस समय की स्थिति की 'सत्य छाप' (Impartial Impression) होता है। तकनीक पक्षपाती नहीं होती, वह केवल तथ्यों को प्रस्तुत करती है। निष्कर्षः सत्य अब बंधक नहीं रहेगा पॉकेट गवाह से डिजिटल गवाह तक का यह सफर भारतीय न्याय प्रणाली में पारदर्शिता की एक नई सुबह है। जब साक्ष्य डिजिटल और अकाट्य होंगे, तो जांच एजेंसियों की 'गढ़ने' की शक्ति स्वतः समाप्त हो जाएगी। मेरा मानना है कि न्याय एक ऐसी ढाल होनी चाहिए जो निर्दोष की रक्षा करे, न कि ऐसा हथियार जो किसी के इशारे पर चले। सत्य को सूरज की तरह चमकना चाहिए, उसे किसी की जेब में दफन होने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

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