अनूपपुर।
सरकारी सेवा में तबादला एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मानी जाती है, जिसका उद्देश्य पारदर्शिता, निष्पक्षता और कार्यकुशलता बनाए रखना होता है। लेकिन अनूपपुर जिले के जनजाति कार्य विभाग में यह प्रक्रिया सवालों के घेरे में आती नजर आ रही है।
जानकारी के अनुसार, विभाग में क्षेत्र संयोजक के पद पर पदस्थ संतोष वाजपेई पिछले लगभग 12 वर्षों से एक ही जिले और एक ही पद पर कार्यरत हैं, जबकि शासन की तबादला नीति के अनुसार किसी भी अधिकारी का एक स्थान पर अधिकतम तीन वर्ष का कार्यकाल निर्धारित है।
लोकायुक्त प्रकरण के बाद भी यथावत पद-स्थापना
सूत्रों के मुताबिक, वाजपेयी कुछ वर्ष पूर्व लोकायुक्त संगठन द्वारा रिश्वत लेते हुए पकड़े गए थे, जिसमें उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज हुआ। ऐसे मामलों में सामान्यतः विभागीय जांच और स्थानांतरण की कार्रवाई की जाती है, लेकिन इस प्रकरण में वे अब भी उसी पद पर बने हुए हैं। यह स्थिति कई प्रश्न खड़े करती है—क्या विभागीय कार्रवाई पूरी हुई यदि हुई, तो उसका निष्कर्ष क्या रहा और यदि नहीं, तो अब तक लंबित क्यों है?
तबादला नीति के पालन पर प्रश्न
मध्यप्रदेश शासन की स्थानांतरण नीति स्पष्ट रूप से लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने से रोकती है, ताकि प्रशासनिक निष्पक्षता बनी रहे। ऐसे में 12 वर्षों का कार्यकाल अपने आप में असाधारण माना जा रहा है।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि क्या संबंधित अधिकारी को उच्च स्तर का संरक्षण प्राप्त है या फिर विभागीय व्यवस्था में कहीं न कहीं नियमों के पालन में शिथिलता बरती जा रही है?
आदिवासी हितों से जुड़ा संवेदनशील विभाग
जनजाति कार्य विभाग का दायित्व आदिवासी समाज के शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक विकास से जुड़ा है। ऐसे में विभाग की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल स्वाभाविक रूप से विश्वास और पारदर्शिता से जुड़े हैं।
प्रशासन की भूमिका पर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जिला व संभाग स्तर के अधिकारी इस स्थिति का संज्ञान लेते हैं, और क्या शासन की तबादला नीति एवं विभागीय नियमों का समान रूप से पालन सुनिश्चित किया जाता है। जनता और विभाग से जुड़े हितग्राहियों की अपेक्षा है कि प्रशासन इस विषय में स्थिति स्पष्ट करेगा और आवश्यक कार्रवाई करेगा।
"इनका कहना "
मैं अभी बाहर हूं आप अगले सप्ताह मुझसे चर्चा कर सकते हैं - सुरभि गुप्ता कमिश्नर शहडोल संभाग


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